Wednesday, January 9, 2019

पाकिस्तानी हिंदू 'बच्चे' का ऊंट की पीठ से अमरीका तक का सफ़र

उनकी उम्र महज़ पांच साल थी जब पहली बार रोज़गार का बोझ उनके कंधों पर आ गया था. उन्हें संयुक्त अरब अमीरात ले जाया गया जहां वह ऊंटों की दौड़ में सवार का काम करते थे.

सरपट दौड़ते ऊंट की पीठ पर सवार उस पांच साल के बच्चे को इसके बदले में केवल दस हज़ार रुपये मिलते थे. वह इस पैसे को घरवालों को भेज देते थे.

सन 1990 में शायद ये काफ़ी रक़म होगी, लेकिन इसे कमाने में उनकी जान जा सकती थी. उस समय उनके सामने उनके दो दोस्त ऊंट से गिरकर मर चुके थे. हादसा उनके साथ भी हुआ लेकिन वह बच गए.

इसी तरह से पांच साल बीत गए. सन 1995 में संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ़ ने सैकड़ों ऐसे बच्चों को आज़ाद करवाया जो ऊंट की दौड़ में सवार के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे.

जीवित बच जाने वाले ख़ुशनसीबों में वह भी शामिल थे. वह वापस पाकिस्तान के रहीमयार ख़ान में अपने घर में लौट आए और फिर यहीं से पढ़ाई का सिलसिला शुरू हुआ. आर्थिक स्थिति अब ऐसी नहीं थी कि घरवाले उनका ख़र्च उठा पाते. इसलिए उन्होंने ख़ुद छोटे-मोटे काम शुरू कर दिए.

गटर साफ़ करने वालों के साथ काम करने से लेकर रिक्शा चलाने तक उन्होंने हर तरह का काम किया और अपनी पढ़ाई के ख़र्चे ख़ुद उठाए.

22 साल की जद्दोजहद के बाद सन 2017 में ये नौजवान अमरीकी सरकार की ओर से दिए जाने वाली फ़ेलोशिप पर अमरीकन यूनिवर्सिटी के वॉशिंगटन कॉलेज ऑफ़ लॉ पहुंच गया.

क़ानून और मानवाधिकर की पढ़ाई करने के बाद बीते साल वह पाकिस्तान वापस लौट आए और अब ऐसे बच्चों की शिक्षा के लिए काम कर रहे हैं जैसे हालात वह ख़ुद देख चुके हैं.

पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय से संबंध रखने वाले इस युवा का नाम रमेश जयपाल है, और ये उन्हीं की कहानी है.

पंजाब प्रांत के शहर रहीमयार ख़ान से चंद किलोमीटर दूर लियाक़तपुर के एक गांव में हाल में उनकी कोशिशों से हिंदू समुदाय के बच्चों के लिए एक टेंट में छोटा सा स्कूल स्थापित किया गया है.

चोलिस्तान की रेत पर खुली हवा में बने इस स्कूल में बैठे रमेश जयपाल ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि उन्हें शिक्षा हासिल करने की लत अरब के रेगिस्तानों में लगी जब वह एक सवार के तौर पर काम करते थे.

उन्होंने कहा, "मेरी पढ़ाई के दौरान कई रुकावटें आईं. मगर मैंने इसे टुकड़ों में ही सही लेकिन जारी रखा."

जान हथेली पर लेकर ऊंट की सवारी
सन 1980 और 1990 के दशक में दस साल से छोटी उम्र के बच्चों को ऊंटों की दौड़े में इस्तेमाल किया जाता था.

अरब देशों में होने वाली इन पारंपरिक दौड़ों में ऊंट के ऊपर पर सवार बच्चा जितना ज़्यादा रोता था ऊंट उतना तेज़ दौड़ता था.

यही वजह थी कि इस पर सवार होने वाले बच्चों का सोच-समझकर चुनाव होता था. ऊंटों के अमीर मालिकों को ऐसे बच्चे दुनिया के पिछड़े देशों से बड़ी आसानी से मिल जाते थे. पाकिस्तान के बहावलपुर, रहीमयार ख़ान, ख़ानीवाल और दक्षिणी पंजाब के कई इलाक़े भी इन जगहों में शामिल थे.

रमेश जयपाल अपने एक बेरोज़गार मामा के साथ संयुक्त अरब अमीरात के शहर अल-ऐन पहुंचे. उन लोगों को वहां आसानी से नौकरी दे दी जाती थी जो अपने साथ 10 साल से छोटी उम्र का बच्चा ले आते थे.

उनके ख़ानदान की भी आर्थिक स्थित ख़राब थी. रमेश कहते हैं, "मगर मेरी मां को ये उम्मीद थी कि भाई के साथ जा रहा है तो उसका ख़याल रखेगा. उन्हें मालूम होता कि वहां कैसे हालात हैं तो शायद कभी न भेजतीं."

"रेगिस्तान के बीचों-बीच हम टेंटों या टीन के घरों में रहते थे. दिन में तापमान 41 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तक चला जाता था और सर्दियों में रातें बेहद ठंडी होती थीं."

सर्दियों में सुबह चार बजे दौड़ की शुरुआत होती थी. बाक़ी दिनों में उन्हें ऊंटों की देखभाल करनी होती थी. इस दौरान उन्हें चारा डालना, सफ़ाई करना और फिर मालिश करनी होती थी.

वह कहते हैं, "दौड़ के दौरान एक हादसे में मेरे सिर में चोट आई, दस टांके लगे. आज भी उसकी वजह से सिर में दर्द उठता है."

रमेश जयपाल ने बताया कि कई बार वापस पाकिस्तान जाने की उनकी कोशिशें नाकाम हुईं क्योंकि उनका पासपोर्ट उनके मालिक के पास जमा था.

पांच साल बाद सन 1995 में यूनिसेफ़ से ऊंटों की दौड़ों में बच्चों के इस्तेमाल पर पाबंदी लागू कर दी गई. सैकड़ों बच्चों को उस समय आज़ादी मिली और रमेश उनमें से एक थे

No comments:

Post a Comment